
!!! डॉ. जगदीश द्विवेदी की वजह से ही मैं पत्रकारिता में हूं !!!
‘अरे, तुम तो बच्चे हो अभी, तुम ही लिखते हो किया किसी और से लिखवाकर भेजते हो।’
डॉ. जगदीश द्विवेदी का गुरुवार को निधन हो गया। डॉ. द्विवेदी ही मेरे लिए पहले व्यक्ति थे, जिनकी वजह से मैं पत्रकारिता में आया, अख़बारों से नाता जुड़ा। जब मैं इंटरमीडिएट का छात्र था, इलाहाबाद में ‘अमृत प्रभात’ अख़बार की तूती बोलती थी।
मुझे लिखने का शौक़ हुआ तो एक लेख लिखकर अमृत प्रभात अख़बार में छपे डाक के पते पर भेज दिया। तब मैं किसी को नहीं जानता, अख़बार में दफ्तर में जाने की हिम्मत भी नहीं कर सकता था, इसलिए डाक से भेज दिया। मुझे एक प्रतिशत भी उम्मीद नहीं थी कि लेख छपेगा। ठीक एक सप्ताह अमृत प्रभात में ‘भारत का निरंतर बदलत स्वरूप’ शीर्षक से लेख छप गया। मेरे लिए खुशी का ठिकाना नहीं था। कुछ दिनों बाद फिर एक लेख भेजा, इस बार भी छप गया। इसी तरह कई बार जब लेख छप गया तो ‘अमृत प्रभात’ अख़बार के दफ्तर पहुंच गया। वहां जाकर पता किया कि कौन मेरे लेख छापता है।

डॉ. जगदीश द्विवेदी का नाम पता चलने पर उनके पास पहुंचा, वही कार्यकारी संपादक थे।
मुझे देखकर डॉ. द्विवेदी हैरान- ‘अरे तुम तो बच्चे हो अभी, तुम ही लिखते हो किया किसी और से लिखवाकर भेजते हो?’
फिर घुमा फिराकर बहुत बातें की। बात करने का मकसद यह परखना था कि मैं खुद लिख लेता हूं या नहीं। एक तरह से मेरा साक्षात्कार लिया उन्होने।
फिर उन्होंने मुझे बराबर छापना शुरू कर दिया। कई बार वो मुझे लिखने के लिए विषय भी बताते थे। हालांकि उनके बारे में अधिकतर लोगों का कहना है वे अच्छे स्वभाव के नहीं थे, लोगों को बहुत डांटते थे। लेकिन, मेरे लिए मार्गदर्शक थे, किस चीज़ को कैसे लिखा जाता है, ये बात वो मुझे समझाते थे।
उनके निधन से मैं बहुत दुखी हूं।
इम्तियाज गाज़ी

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