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O P Singh का छक्का : लखनऊ-नोएडा में पुलिस कमिश्नरी !

एक तरह से ओपी सिंह ने सही मायने में अपने को सिंघम या कहें तो बाहुबली साबित कर दिया है।

उत्तर प्रदेश में पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू

ओपी सिंह का छक्का!!

स्नेह मधुर

इसे संयोग कहें या उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह की कुशल रणनीति का परिणाम कि नोएडा के निलंबित एसएसपी वैभव कृष्ण कांड से उत्तर प्रदेश पुलिस की जो थू-थू हो रही थी, उसकी आड़ लेकर ओपी सिंह ने उत्तर प्रदेश में एक नए स्वर्णिम युग की शुरुआत करा के न सिर्फ उस कलंक को धो दिया बल्कि अपने धुर विरोधियों का भी दिल जीत लिया।

उत्तर प्रदेश में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने से पूरे पुलिस विभाग में ओपी सिंह के जयकारे के नारे लगा रहे हैं। सिपाही से लेकर एडीजी तक सबकी बांछें खिली हुई हैं। प्रदेश के आठों जोनों के एडीजी के चेहरों पर मुस्कुराहट तैर रही है कि आज नहीं तो कल यानी कुछ महीनों में प्रयागराज, मेरठ, कानपुर सहित सभी जोनों में यह प्रणाली लागू होने की पृष्ठभूमि तैयार हो ही गई है। जितने भी डी आईं जी और आईजी हैं, वे मस्त हो गए हैं कि आने वाले दिनों में उनके अच्छे दिन आने की गारंटी हो गई है, जिओ ऑपी सिंह!

यानी अपने रिटायरमेंट से एक पखवारे पहले माघ के महीने में लोहड़ी के दिन यह छक्का मारकर मात्र दो-तीन लोगों को ही निराश कर बाकी सारे लोगों को खुश कर लिया ओपी सिंह ने। हां, पूरी की पूरी आईं ए एस लाबी भी दुखी आत्मा हो गई है क्योंकि यह काम बिना मुख्यमंत्री की पूर्ण सहमति के संभव नहीं था और यह माना जाता रहा है कि किसी भी मुख्यमंत्री को राजी कर पाने का दम और अधिकार सिर्फ आईं ए एस के पास ही होता है। पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन भी कमिश्नर प्रणाली के विरोध में खुलकर आ गए थे। लेकिन ओपी सिंह इस प्रदेश के संभवतः पहले डीजीपी बनने में सफल हुए हैं जिन्होंने न सिर्फ आईं ए एस लाबी की घेरेबंदी के बाद भी मुख्यमंत्री का विश्वास हासिल किया बल्कि वह काम कर दिखाया जिसके हो पाने की कल्पना भी कोई आई पी एस नहीं कर पाया होगा। एक तरह से ओपी सिंह ने सही मायने में अपने को सिंघम या कहें तो बाहुबली साबित कर दिया है।

ऐसा नहीं है कि ओपी सिंह उत्तर प्रदेश के पहले डीजीपी हैं जिन्हें मुख्यमंत्री का वरदहस्त प्राप्त है। ओपी सिंह के पहले योगी की सरकार में सुलखान सिंह भी बहुत करीबी रहे हैं और उन्हें भी “खुला हाथ” मिला हुआ था। योगी ने उन्हें भी पूरी छूट दे रखी थी। अखिलेश यादव और जगमोहन यादव की निकटता से हर कोई वाकिफ है। ए सी शर्मा, विक्रम सिंह, प्रकाश सिंह भी अपने समय के मुख्यमंत्रियों की नाक के बाल बने रहे, डीजीपी की शक्तियों का आनंद उठाया लेकिन पुलिस हित में कमिश्नरी प्रणाली लागू कराने की दिशा में गंभीरता से सोचा तो सिर्फ ओपी सिंह ने। पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली से जनता को लाभ होगा या नहीं, लेकिन पुलिस की साख और शान बढ़ेगी, यह तय है। पुलिस विशेषज्ञों का मानना है कि निश्चित रूप से पुलिस और जनता को लाभ मिलेगा और पुलिस के मुखिया का काम ही पुलिस व्यस्था में सुधार लाना है ताकि पुलिस की कार्य क्षमता और विश्वसनीयता में बढ़ोत्तरी हो। इस दिशा में उठाए गए कदमों की सूची बनाई जाए तो निश्चित रूप से ओपी सिंह का पलड़ा भारी दिखता है।

ओपी सिंह की यह सफलता इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि पुलिस में सुधारों की बात वर्षों से की जाती रही हैं लेकिन कोई भी मुख्यमंत्री यह कदम नहीं उठा पाया। आज सारे पूर्व मुख्यमंत्री अपने आपको कोस रहे होगें कि उन्हें इस तरह की अक्ल देने वाला कोई अफसर क्यों नहीं मिला? क्योंकि इसका प्रशासनिक के साथ राजनैतिक लाभ भी मिलेगा और मुख्यमंत्री योगी के चेहरे की मुस्कान आज की प्रेस कांफ्रेंस में बता रही थी कि उनका यह दांव बेमिसाल है।

ओपी सिंह की इस सफलता में इस बात को भी रेखांकित किए जाने की आवश्यकता है कि उन्होंने ऐसे मुख्यमंत्री का विश्वास जीता जो निहायत ईमानदार है, जिसकी  व्यक्तिगत ईमानदारी पर कोई शक नहीं है। भले ही प्रदेश में भ्रष्टाचार जारी हो लेकिन वह मुख्यमंत्री स्तर पर नहीं है। फिलहाल पहले की तरह कोई यह कहने वाला नहीं मिलता कि उसने सी एम स्तर से इतना देकर यह काम करवा लिया। मुख्यमंत्री की ईमानदारी की बात तो चार दिन पहले पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह ने अपने ट्वीट में खुद स्वीकार की है। यानी ओपी सिंह ने तो काजल की कोठरी में बैठकर भी एक ईमानदार मुख्यमंत्री का दिल जीत लिया, निश्चित रूप से यह बड़ी बात मानी जाएगी। क्योंकि ऐसा नहीं है कि पुलिस में अच्छे और ईमानदार लोग नहीं हैं लेकिन अपने ईमानदार बॉस की नजर में भी ईमानदार बनकर उसका विश्वास लगातार हासिल करते रहा जाए, यह भी आसान नहीं है। और वह भी तब जब उत्तर प्रदेश की पुलिस के पितामह प्रकाश सिंह मुख्यमंत्री को ट्वीट कर यह बताने की कोशिश करें कि आप ईमानदार हैं, आपका ऑफिस भी ईमानदार है लेकिन पुलिस में सबकुछ ठीक नहीं है, पोस्टिंग में पैसा लिया जा रहा है। पैसा कहां जा रहा? एफ आई आर लिखी नहीं जा रही है…। 

लेकिन हां, प्रकाश सिंह ने वैभव कृष्ण को ईमानदारी का प्रमाण पत्र देकर यह बता दिया कि कम से कम एक ईमानदार अफसर तो है यूपी में जो अपने आप को इस भ्रष्ट माहौल में असहज पा रहा है। लेकिन सवाल उठता है कि जिस नोएडा का रेट 80 लाख रुपए बताया जा रहा है, उसकी पोस्टिंग वैभव को किन शर्तों पर मिली थी? क्या वैभव ने 80 लाख दिए थे या सिफारिश कराकर कुछ कम में हासिल किया और फिर उस रकम को कैसे चुकाया?

अपने चार दशक के अनुभव में मैंने तमाम विभागों, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और अफसरों का भ्रष्टाचार देखा है। थानों, जिलों और टॉप बॉस की पोस्ट की बिक्री खूब देखी है। तीन-तीन करोड़ देकर तीन महीने के लिए एक्सटेंशन लेने वाले भी देखे हैं। उन्हें चैनल पर आजकल ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हुए भी देखता हूं। ऐसे-ऐसे डीजीपी देखें है जिनके ज़माने में एस एस पी थानेदारों की जेब से भी पैसे निकाल लेने में भी नहीं सकुचाते थे, कत्ल कराने की सुपारी तक लेने वाले अफसर देखे हैं। प्रकाश सिंह दो बार इस सूबे के प्रमुख रह चुके हैं। काश, उस समय भी सही ढंग से एफ आई आर लिखी जाती होती! जब एक बार डीजीपी पद से प्रकाश सिंह हटाए गए थे तो उन्होंने दूसरा पद स्वीकार नहीं किया था। कुछ दिन अज्ञातवास में रहे। बाद में जब फिर वहीं पद मिला तो अवतरित हुए थे।

श्रीराम अरुण नामके एक डीजीपी हुआ करते थे। वह हर मीटिंग में पुलिस वालों से एफ आईं आर लिखने की अपील किया करते थे। हालांकि उनकी बात कभी नहीं सुनी गई क्योंकि एफ आईं आर की संख्या से कानून- व्यवस्था की स्थिति का आकलन किया जाता था। कोई डीजीपी एफ आई आर लिखने की गारंटी नहीं दे सकता है। यह पूर्ण रूप से मुख्यमंत्री के ऊपर निर्भर होता है कि वह विपक्ष को किस तरह से झेलने की क्षमता रखता है।

ऐसे तमाम लोग यह कहते मिल जायेंगे कि इस पोस्ट का यह रेट चल रहा है। लेकिन ऐसे भी लोग मिल जाते हैं कि वह पैसा लेकर घूम रहे हैं, सही आदमी मिल जाए। उन्हें सही आदमी नहीं मिल पा रहा है। कुछ लोग काम न होने पर पैसा वापस लेने के लिए किसी दबंग की तलाश में भी घूम रहे हैं।

बहरहाल, वैभव कृष्ण कांड ने उत्तर प्रदेश पुलिस के कायाकल्प किए जाने के सोपान खोल दिए हैं। अगर ओपी सिंह को सेवा विस्तार मिल जाता है तो और भी बहुत कुछ संभव है। फिलहाल, इस उम्र में को गई प्रकाश सिंह की टिप्पणी ने ओपी सिंह का कद और भी बड़ा कर दिया है। ओपी सिंह भाग्यशाली है कि अपने को साबित करने के लिए उन्हें इतने चुनौतीपूर्ण अवसर मिले और इस बात के लिए भी भाग्यशाली हैैं कि उन्हें मुख्यमंत्री योगी का पूरा संरक्षण मिला। वैभव कृष्ण ने तो नोएडा के आखिरी निलंबित एस एस पी के रूप में अपना नाम इतिहास के पन्नों पर दर्ज करा ही लिया है!!!

वैसे, एस वी एम त्रिपाठी भी 1979 में कानपुर के पहले पुलिस कमिश्नर के रूप में अपना नाम इतिहास में दर्ज करा चुके हैं जिन्हें बिना चार्ज लिए ही बीच रास्ते से लौटना पड़ा था क्योंकि तत्कालीन मुख्यमंत्री राम नरेश यादव ने आई ए एस लाबी के दबाव में अपना फैसला पलट दिया था।

उत्तर प्रदेश के पहले पुलिस कमिश्नर नियुक्त किये गये-

आलोक सिंह – नोयडा

सुजीत पाण्डेय – लखनऊ

*गौतमबुद्धनगर पुलिस कमिश्नरी व्यवस्था -*:

●कुल 38 वरिष्ठ पुलिस अधिकारी संभालेंगे जनपद की पुलिस व्यवस्था
● पुलिस आयुक्त-1
●अपर पुलिस आयुक्त-2
●पुलिस उपायुक्त-7
●अपर पुलिस उपायुक्त-9
●सहायक पुलिस उपायुक्त-17
●सहायक रेडियो अधिकारी-1
●मुख्य अग्निशमन अधिकारी-1

Sneh Madhur

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